Saturday, December 29, 2012

दो वक्त कि रोटी


  1. कितने लोगो को दो वक्त कि रोटी मिलती है
    और कितनो की सुबह उम्मीदों से मिलती है
    सर्द रातों में ठिठुरते तन को चीट नसीब कहां
    सर छुपाने को मिलीं जिन्हें नीली छतरी यहां
    जिनके के दम से रौशन सत्ता के गलियारे है
    वह शासन और प्रशासन से हुए किनारे है
    ... आवाज़ दब सी गयी भीड़ में गला दुखने तक
    कोई भी सुध नहीं लेता गरीब के मरने तक
    सियासत को इंतज़ार इस भीड़ के गुजरने का
    पक्ष और विपक्ष को इंतज़ार मुद्दा मिलने का
    किसी की मौत किसी की रोटियां है सिकती
    खामियाजा गरीब की जिंदगी कौड़ियों में बिकती..................
     

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