Saturday, November 9, 2013

सच्ची वेदना सवेदना

एक दर्द एक चीख एक पुकार है,
कंटक शूल सी चुभती खार है !
बैचैन खाली गुजरते हर सत्र,
नित मैले मलिन होते चरित्र !
 कष्ट कम्पित उभरती वेदना,
मायूसियों का ह्रदय भू भेदना !
लिख रहा हुँ मैं भाव विधि,
मिट गयी हर अनमोल निधि !
 भूख गरीबी कण कण बसी,
कही खो गयी निश्छल हसी !
हर अंतरात्मा छलनी हुयी,
अपराध आवश्यकता की जननी हुयी !
रिश्तो में उभरी एक दरार है,
सब पराये स्वार्थ का करार है !
 हुयी महंगाई इंसान बिक रहा है,
 लुप्त सच्चाई फरेब टिक रहा है !
 बहशी अस्मत से खेल इतिहास लिख रहा है!
काल के आगोश में संसार दिख रहा है !
जाने कितने दर्द कितनी चीख कितनी पुकार है,
भूमी के सीने पर चुभती कंटक शूल सी खार है !
 अफसोस मैं बस सवेदना लिख रहा हुँ,
ह्रदय की सच्ची वेदना लिख रहा हुँ !

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