Wednesday, July 31, 2013

बदन के नग्न उभार झाके उजले उजले

  1. ...
    Photoवह् निकल पड़ी रोजी रोटी को
    नीलाम करने अपनी बोटी को
    बदन के नग्न उभार झाके उजले उजले
    ढक सके उसके तन को नुचे कुचले
    लज्जा शर्म से गड़ी हुयीं थी एक नारी
    माँ बनना, थी उसकी सबसे बड़ी बिमारी
    सिसकी अपने दुर्बल भूखे बच्चो की
    भूल गयी चिन्ता अपने अस्मत की
    नग्न झाँकते तन को भूल
    गिद्ध नजर के भेदते शूल
    वह् निकल पड़ी रोजी रोटी को
    नीलाम करने अपनी बोटी को
    कहने को बरसो पहले मिली आजादी है
    पर जस के तस जरूरत वही बुनियादी है
    युग बदले पर यह हालात बदले
    बद से बदतर क्या आज क्या पहले
    कर्जे में डूबे गिरते घर के टूटे से छज्जे
    भूख प्यास से बोझिल मृत शरीर के मंझे
    बेबस मन बस म्रत्यु दामन में लेने को मचले
    पर माँ तो माँ है मन में ममता का भाव पले
    सो........... वह् निकल पड़ी रोजी रोटी को
    नीलाम करने अपनी बोटी को………………

    वह् निकल पड़ी रोजी रोटी को
    नीलाम करने अपनी बोटी को………………

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