Monday, August 13, 2012

आँख


  1. इन आँखों ने देखे मंज़र बहुत
    कभी आँखें थी मेरी कभी आँखें थीं तेरी
    इन्हीं आँखों में पलते सपने बहुत
    कभी डबडबाई तेरी कभी डबडबाई मेरी
    टूटे जो सपने कभी जब अपने
    आँखों को खलती निराशित परछाई
    ...
    मन्शा नहीं था दिल को दुखाना
    पर आँखों का तो है काम दिखाना
    दर्द कि सतह या खुशी का ठिकाना
    आँखें भला करे क्या बहाना
    मजबूर आँखें क्या मेरी क्या तेरी
    इन आँखों ने देखे मंज़र बहुत
    कभी आँखें थी मेरी कभी आँखें थीं तेरी

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