Wednesday, May 16, 2012

परदेश


परदेश आए दिन बीते,
अब याद सताये घर आँगन !
हृदय बसा माँ का आँचल,
पिता का प्यार मन भावन !
तरस गए उस बंसंत ॠतु को,
मन बसा रिमझिम सावन !
कोसों दूर घर द्वार हुआ,
जिसे आज भी ढूँढे मेरा मन !
पर दुविधा इस रोजी रोटी की,
करूँ चाहे मै कोई जतन !
घर आँगन तो स्वप्न हुआ,
परदेश हुआ बस अपना जीवन !
बीत गया वह हँसना रोना,
खेलो में डूबा मस्त बचपन !
तितली के संग भाग दौड़,
कागज की नाव में मगन !
छूठ गए सब सेंगी साथी,
क़समें वादों के बंधन !
अब विरह देश संग रही,
शेष बचीं है एक तड़पन !
कोई विधि समझ न आए,
फिर कैसे मिलें वह् घर आगन !
मात पिता का स्नेही स्पर्श,
वह सेंगी साथी और बचपन !
परदेश आए दिन बीते,
अब याद सताये घर आँगन !

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