Wednesday, May 16, 2012

रसुखदार


उसूलो को ताख रख।
रसुखदार बन बैठे।।
बैमानी कि चादर तान।
इमानदार बन बैठे।।
देश पर बपौती।
गजब दुकानदार बन बैठे।।
खादी में छिपे यह।
सियासतगार बन बैठे।।
इन्हे सत्ता सौप के हम।
गुनाह्गार बन बैठे।।
अजब तमाशा है की।
चोर ही तलबगार बन बैठे।।
मलाल क्या करे जब।
हम बेकार बन बैठे।।
कानुन से खेलते।
जुर्म के सैसवार बन बैठे।।
रोक नहीं इन पर।
हुक्मरान हरबार बन बैठे।।
उसूलो को ताख रख।
रसुखदार बन बैठे।।

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