Wednesday, May 16, 2012

मेरी माँ


रात लंबी तो लोरी है
पड़े अकेले तो हमजोली है
शब्द नहीं तो बोली है
माँ दुलार की झोली है
माँ शब्द जिसमे असीम ममता समाहित है, उसकी आँखों में सदैव हमारे ही सपने पलते है, बचपने की मंद मुस्कान अपने लाल के होठों पर देख् जो गाद गाद हो जाती है, जरा स ठोकर लगने पर जो ख़ुद की पीर से कहीं ज्यादा कराह उठती है, हमारे सिराने जिसने कितनी रातें अपनी गोद का तकिया देकर ख़ुद की नींद को विराम लगाया है, जिसने हम्हारे मुँह में जाते निवाले से ख़ुद तृप्ति महसूस की है वह् माँ ही है, क्या तेरी क्या मेरी माँ तो आख़िर माँ है..............

No comments:

Post a Comment