Wednesday, May 16, 2012

उजाले की खोज


मै उजाले की खोज में जाने कितनी दूर निकल आया
अन्धेरा था आंखो का हमनशि और वक्त किया जाया
सुना अनसुना कर दिया जब किसी ने सच था बताया
सच के आइने से हुआ रुबरु अब एक ऐसा वक्त आया
ना मैंने ही किसी से पुछा और न किसी ने ही बताया
और हुई बहुत देर जब मुझे असल मंज़र समझ आया
कि उजाले की खोज में मै कितनी दूर निकल आया
यकीन न करना फितरत में शामिल तो हश्र ने रुलाया
मिला इशारा अपनो का जिसे ज़हन ने गैर था बताया
गैरियत के बावस्ता किसी को अपना न समझ पाया
काश इस जमाने से कछ हमदर्द हमने भी चुने होते
बाँट कर गम और खुशी दिल से दिल के तार बुने होते
हाथ जो लौटे नाकाम होकर वे सफर में ख़ास बने होते
बजाय मुफ्फलसी दोस्तों की फेहरित में कुछ जने होते
आज नाकामियों के बाद मुड़ के देखा तो नदारत साया
मै उजाले की खोज में जाने कितनी दूर निकल आया
अन्धेरा था आंखो का हमनशि और वक्त किया जाया

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