Wednesday, May 16, 2012

बुलंद मशाल


अन्धेरे ग़र मिटाने है तो बुलंद मशाल जरूरी है
आतायी घुमते खुलकर उनका इंतकाल जरूरी है
गरजते बादलो बरसो कि अब बरसात जरूरी है
है मसले कई अनसुलझे अब हर बात जरूरी है
पड़े दिन के उजाले कम अब हर रात जरूरी है
कौमी कमजोरियों तोड़े आज हर जात जरूरी है
वक्त यूँही न गुजर जाए जंग का आगाज जरूरी है
दफन शोले हर दिल में दिखे वो आग जरूरी है
जला दे जुल्म की आँधी आज वह् अंगार जरूरी है
जुनुन ठंडा न पड़ जाए जंग-ऐ ऐलान जरूरी है
अकेले सदियां है बीती अब हर मुलाकात जरूरी है
कदम मिलाने ही होंगे की अब हर हाथ जरूरी है
कब तक तन्हा रहेंगे हम सबका साथ जरूरी है
अर्जी ताख पर रखकर अब घूस और लात जरूरी है
किसने अमन चैन छीना उनकी शिनाख्त जरूरी है
फर्ज़ माटी का ऐ दोस्तों अब तो इंसाफ जरूरी है
जला दे जुल्म की आँधी आज वह् अंगार जरूरी है
अन्धेरे ग़र मिटाने है तो बुलंद मशाल जरूरी है
आतायी घुमते खुलकर उनका इंतकाल जरूरी है

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