Wednesday, May 16, 2012

प्रेम अगन


झरोखों से आती मंद पवन
कभी तो समझ मेरा मन
घिरी घटाओ समझो प्रेम अगन
अब तो बरसो आयो सावन
घने बादलो में छिपे रस्ते खोये
पिया आगमन को नयन टटोहे
अखियाँ पिया के स्वप्न सजोये
यह विरह की घड़िया खटके मोहे
लागी मोहे प्रिय की ऐसी लगन
हो मिलन करो कुछ ऐसा जतन
निरी प्रतिछा में न टूटे यह तन
अब हवाओं आओ पीह के संग
घटाओ बनो तुम आज दर्पण
जिसमे दिखे बस मेरे सजन
झरोखों से आती ऐ मंद पवन
अब तो समझो तुम मेरा मन

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