Wednesday, April 11, 2012

टिक टिक घड़ी

टिक टिक घड़ी चलती रही 
बात बनती फिर बिगड़ती रही 
समय के आलेख पर उभरती तसवीर
कल तक तो थी पर आज हुई छीर्ण 
ओस कि बूँदों में छार कि अनूभूतियाँ 
अश्रु विलय हुई आस् कि प्रतिलीपिया 
धरा की गोद में आग की चिंगारिया
छा गयी गगन में काल क्रोध बदरियाँ
सिन्धु प्रवाह सब बहाने को तैयार है
पवन की रफ्तार में अंधड़ प्रहार है
प्रकृति ने मानस का मनोरूप धर लिया
अती इंसान कि जो विकृत रूप कर लिया
मूल्यों को त्याग जीवन धन बदल दिया
निर्माण के नाम प्रकृति घात कर दिया
परंपराओं ने अनगिनत दीप थे जलाये
विकास की आड़ में हम धरोहर मिटाये
बारूद की सुरंग रात की कालिमा
खो गयी कहीं नवप्रभात की लालिमा
तन को जलाये उषा कि ऊष्मा
विलुप्त हुआ चाँदनी बिखेरता चन्द्रमा
कदमो कि की खोज पर धरती नहीं
जिंदगी यु ही बदलती रही
टिक टिक घड़ी चलती रही
बात बनती फिर बिगड़ती रही

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