Monday, March 12, 2012

सोच कर देखो

सोच कर देखो
इस सोच के साथ
की सोच स्वार्थ से परे हो
बोल कर देखो
ऐसे शब्दों के साथ
जो सर्वकर्ण प्रिय हो
कैसे मतभेद
और कब तक मतभेद
त्यागों अपना पराया
कैसा निपट दिखावा
जकड़ी मन में जंजीरें
पहुँची मधुर विष तीरे
न्याय नहीं मुक्त मन से
बिछड़े सात्विकयुक्त तन से
अंतर्मन मौन हुआ
फिर मन का मालिक कौन हुआ
कटु सत्यं स्वीकार नहीं
नैतिकता पर अधिकार नहीं
जाने किस बंधन बंधे हुए
संकीर्णता से जड़ें हुए
संस्कार भी विलुप्त हुए
सारे काज गुप्त हुए
रची कहानियों के सानिध्य से
ज्ञात हुआ तुम जगते थे भीतर से
फिर कब कैसे अज्ञात हुए
बीती पुरानी बात हुए
क्या पुन्हा मिल पाओगे
क्या फिर ठहर जाओगे
मिलो कभी इस सकल्प से
न जाने की इच्छा से
की नाम सुना सा न लगे मात्र
इंसानियत भरा हो हर पार्थ
हां इंसानियत मै ठुंठता
स्वम में पता पूछता
हार गया थक गया
उदास मन ठुंठता
मिलो फिर मिलो
शान्ति और अमन के लिए
जूझते जीवन के लिए
टूटते सपनो के लिए
घृणित मन बदलाव के लिए
मिलो फिर मिलो
हर इनसान के भीतर
इंसानियत के लिए
मिलो फिर मिलो
ना जाने के लिए
ए इंसानियत तुम मिलो
इनसान से हैवान हुए
इनसान के लिए मिलो
मिलो फिर मिलो
इन्सानियत फिर मिलो...........

No comments:

Post a Comment