Thursday, March 1, 2012

रोजाना फेसबुक पर दिखना,

वही बातें लौट फेर कर लिखना,
और रोजाना फेसबुक पर दिखना,
अब नहीं भाता!
देश के मौजूदा हालातों पर रोश आना,
क्रांति के नाम पर बेवजह जोश आना,
अब नहीं भाता!
अण्णा पर सियासियो कि बेशर्म टिप्पणी,
बाबा राम देव पर आई मुसीबत घनी,
अब नहीं भाता!
यह न समझे की हार गए हम सारे,
जियेंगे तमाम जिंदगी उम्मीद के सहारे,
दब के रह गए जोश-ए जज़्बात हम्हारे,
या साथ नहीं जब उबलते लहू तुम्हारे,
बल्कि रोज़ का तमाशा, चोट सौ सुनार कि,
दिलों में दबी चिंगारी, आंदोलन के पुकार की,
अब नहीं भाता!...अब नहीं भाता!...
जरूरत चिंगारियो में भीषण आग की,
हो लबो पर बात वह जो हो लाख की,
जोश में चलना फिर थक के कहीं रुकना,
राजनीति की चल तले सविधान का झुकना,
अब नहीं भाता!
घिनौनी सियासत और जनतंत्र का किलसना,
मौलिक अधिकारों कि बातें जहा करना मना,
अब नहीं भाता!
देश के भीतर मिलीं देशद्रोहियो को पनाह,
फैसले के हक़दार वे जिनके नामदर्ज कई गुनाह,
अब नहीं भाता!
वही बातें लौट फेर कर लिखना,
और रोजाना फेसबुक पर दिखना,
अब नहीं भाता!

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