Monday, March 12, 2012

दुर्दशा


दुर्दशा
जानवरियत कि हद तक
मै इनसान था
भूल गया
पूर्वज वानर थे
हम फिर वानर हुए
वह बन्धुआ नहीं थे
हम स्वतंत्र नहीं
वे आज़ाद घुमते रहते थे
हम बंन्दिशो से बेहाल हुए
मौलिक अधिकारों से वंचित
माणुस से अमानुस हुए
पहचान कौन
कौन पहचाने
एक लंबी कतार में
अपनी पहचान से
तार तार हुए
मान सम्मान बेमानी
हुयी बेशर्म कहानी
बदल गयी कैसे तस्वीर
उलाहना भरी मन की पीर
अब आँखें भी अश्रु विहीन
हालातों के हुई अधीन
पशु जीवन जीने को तैयार
विलुप्त परिवर्तन का संचार
हा मानुस से हुआ अमानुस
और मै इनसान था
भूल गया…...भूल गया……
दुर्दशा
जानवरियत कि हद तक
मै इनसान था
भूल गया!

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