Monday, March 12, 2012

कोई ना जगायेगा

कोई ना जगायेगा ख़ुद ही तू जाग 
जागो भाइ जागो, भोर हुई
चिड़ि़यों का चहचाना
मंद पवन का बहना
मन्दिर में शंखनांद
और भोर की पहली अज़ान
अब सुनाई ना देगी
मुर्गे की बाग़
दुहती गाय का झाग
अंगीठी का धुँआ
बाल सहलाती बुआ
अब दिखाई ना देगा
मिया का सलाम
हिंदू का प्रणाम
आँगन की चहल
सूर्य अर्क से पहल
दादा की गोदी
दादी का दुलार
साथ में बसता
सयुक्त परिवार
मोह्ल्ले की रौनक
बर्तन की खनक
अब सुनाई ना देगी
किसकी प्रतिक्षा
काहे की इछा
बदला है भेष
बदला परिवेश
परम्परा को त्याग
जिंदगी बेजोड़ हुई
अब तो जगाये घड़ी का अलार्म
तो जागो भोर हुई
पहले परिवर्तन की करते थे मांग
तो क्यू परम्प्राये तेरी चितचोर हुई
अरे वह् ज़िदगी कुछ और थी
यह जिंदगी कुछ और हुई
फिर सत्यं से क्यू भाग
जब स्तिथिया कुछ और हुई
पुरानी मानसिकता के रस्ते को लाँघ
यादे तो खालिश मौखौल हुई
कोई ना जगायेगा ख़ुद ही तू जाग
जागो भाइ जागो, भोर हुई

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