Monday, February 13, 2012

अमावस की रात


यह अमावस की रात इतनी लंबी नहीं!
एक नई नवेली सुबह से दूर तुम भी नहीं! 
सोच को इतना संकीर्ण ना करो!
अपनी उमंगों में इतना तेज भरो!
की हर उदासिया हार के समीप हो!
नजदीकियो में खुशियों के दीप हो!
जिदगी कभी धूप तो कभी छाव है!
कभी हार कभी जीत भरा दाँव है!
किनारे दूर नहीं ये केवट की नाव है!
बदलती दिशाये तो हवा का बहाव है!
जीतता वही जिसे जीत से लगाव है!
दूरियों में सीमा और मंजिले अंधी नहीं! 
आकाश है पुकरता, बंदे तुम बंदी नहीं! 
यह अमावस की रात इतनी लंबी नहीं!
एक नई नवेली सुबह से दूर तुम भी नहीं! 

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