Monday, January 16, 2012

बारुदी खेल


कब कैसे हुआ बारुदी खेल यह मुझको नहीं पता!
फिर भी शक़ से भरी निगाहें मुझको रही सता!
मेरे भी घर आँगन में बच्चे सहमे सहमे से है!
मेरा भी दिल खौफ ज़ैदा इस आतंकी खेमे से है!
हम नवाजी मुस्लिम है और पसंद अमन का रस्ता है!
दिल में खुदा की रहमत से हिदोस्ता ही बसता है!
हिंदू मुस्लिम सिख तो मजहब, इसमें आतंकी किसे रहे बता!
मजहब से ना जोड़ ए बंदे शैतानी आतंक की खता!
कब कैसे हुआ बारुदी खेल यह मुझको नहीं पता!
फिर भी शक़ से भरी निगाहें मुझको रही सता!

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