Friday, December 2, 2011

दुश्मन सियासी


हवाओं में किसने घोल दिया जहर!
किसने लगाई हर नजर पर नजर!
किसकी वजह से बेसुद यह शहर!
खौफ से भरे क्यू यह सारे पहर!
बेलगाम लोगो पर किसकी महर!
मौन क्यू हम क्यू सह्ते है कहर!
लहू शिराओं का गया क्यू ठहर!
जागो जगाओ फिर से वह लहर!
यह देश हम्हारा और हम्हारा शहर!
मिटा दो उन्हें जिन्होंने घोला जहर!
चप्पे चप्पे पर हो जुनुने नजर!
आज भी ना की जो हमने फिक्र!
तो गद्दारो में आयेगा अपना भी जिक्र!
की अपनी ही माटी को सजा ना सके!
देश कि अस्मत को बचा ना सके!
करो देश के लिए कुछ जद्दो जहद!
वरना गुलामी सहेगी अपनी ही सरहद!
जागो रे जागो ऐ हिंद के वासी!
देश के भीतर यह दुश्मन सियासी!
इनसे ही देश में फैला जहर है!
इनके दम से कहर ही कहर है!
जागो जगाओ फिर से वह लहर!
यह देश हम्हारा और हम्हारा शहर!

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