Thursday, September 1, 2011

दस्तक


जिंदगी कि किताब में हर रोज़ एक नया पेज बढ़ता है!
किसी ने कोरा छोड़ा तो कोई इबादत लिखता है!
हार गया जो हालातों से वह कहा जहाँ में टिकता है!
जो मुकाबले को तैयार वही मुख्यपटल पर दिखता है!
अरे हालत हुए बत्तर तो क्या!
जज़्बात हुए घायल तो क्या!
अरे इंसाफ कि गुहार में इनसान जो उलझता है!
वोह दूसरों कि बिसात का मोहरा ही बनता है!
तो ख़ुद लिखो तक़दीर अपनी, दूसरों में बयाने-खिलाफत दिखता है!
क्या हो मत कहो,जो हो वोह ख़ुद-बखुद जमाने को दिखता है
मेरे दोस्त ऐ हमदम मेरे, जो दिखता है वोह ही बिकता है!
वरना जमी पर मट्टी से ज्यादा मोल नही, हर रोज़ यहा गुमनाम मरता है!
हर चोट दस्तक सम्भलने कि देख कब तू सम्भलता है!
जिंदगी कि किताब में हर रोज़ एक नया पेज बढ़ता है!
किसी ने कोरा छोड़ा तो कोई इबादत लिखता है!

No comments:

Post a Comment