Thursday, September 1, 2011

सिकंदर


जो सोचा वही होगा यह जरूरी तो नही!
हा गर ईमान से कि कोशिश तो खुदा बेपरवाह भी नहीं!
हद होती है हर बात कि पर कोशिशों कि इंतहा नही!
रहमो करम पर जिए तो किसी कि खता भी नही!
कोई बदलेगा तसवीर, ऐसी तो किसी कि तक़दीर नही!
जो ख़ुद चाहोगे तो मंजिले इतनी बेदलील भी नही!
अपने हाथों से बनते बिगड़ते है अरमा इंसा के!
तो सफर तय कर मुसाफिर जरा संभल संभल के!
यह दुनिया है मिलेंगे रहीम भी यहीं,रकीब भी यहीं!
हर एक तजुर्बो से मुकम्मल होगी तेरी हस्ती यही!
कौन रुकावट और कौन मांझी तेरी नौका का पहचान तो सही!
ऐ दोस्त मेरे मंजिलों का असल इम्तिहान है यही!
क्योकी जो जीत गया, बखुदा सिकंदर है वही!
जो हार गया वोह गर्दिशो से कभी उबरा ही नही!

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