Friday, August 26, 2011

"आक्रोश आँधी और आज का गाँधी"


अण्णा के आंदोलन ने जैसे जैसे जोर पकड़ा वैसे वैसे कुछ लोगो ने उनके इतिहास के पन्ने पलटने शुरू कर दिए है और कुछ वह अनछुए पहलू जो अण्णा कि छवि धूमिल करे उन्हें उछालना शुरू कर दिया है  जिसे हम सभी जानते है यह वह कोरी कहानिया है जिनका कोई अस्तित्व नही है,मुझे लगता है या तो वे सरकार के चमचे है जो नेताओं के इशारे पर इस तरह कि गतविधियो को अंजाम दे रहे है या विकृत मानसिकता के शिकार है और यह उनकी बीमार मानसिकता का कुक्रत्य है, दोनों ही तरह के लोग देशद्रोही है, इसलिए इस तरह कि प्रजाति से हमें सावधान रहना होगा क्योकि यह लोग पथ भ्रमित करने के उद्देशय से अपनी कारगुजारियों को बड़ी चतुराई के साथ अंजाम दे रहे है, भाइयों आज देश में उठी यह आंदोलन कि लहर अगर थम गई तो आम जनता के पास हाथ मलने के सिवा कुछ भी न बचेगा, याद रहे यह आंदोलन धर्म, प्रदेश,वर्ग के पचड़ों में उलझ कर ना रह जाए और ना ही छोटी मोटी बातों का परिहास बन कर ना रह जाए क्योकि यह आप सभी जानते है कि आज जब सभी एक आवाज़ में विद्रोह का स्वर फुक रहे है तो उसके पीछे जनलोकपाल कि तमन्ना नही बल्कि सदियों से जो राजतंत्र के अत्याचार आम जनता ने सहे है यह आक्रोश उस अत्याचार के खिलाफ है, हमारे देश में हमारे चुने नेताओं ने हमें लूट लूट कर अपना भविष्य तो सुरछित कर लिया और हमारी झोली में महंगाई डाल दी जिसके फलस्वरूप निर्धन मजबूर हो कर या तो आत्महत्या करने लगे या जुर्म कि दुनिया में कूद पड़े,  एक अदद घर का सपना देखना आज पाप हो गया है जमीन माफियो के साथ  हमारे चुने नेताओं ने या तो साझेदारी कर ली या उनसे हर प्रोजेक्ट पर इतना मुँह खोल दिया कि मकानो के दाम आज दस गुना हो गए, जो आम आदमी कि पहुँच से बाहर है, कुछ ही समय में डीज़ल पेट्रोल ने ऐसी तेजी पकड़ी के जनता कि पकड़ ही ढीली पड़ गयी, साँग सब्जी और दाल चावल कि क्या बात करे आप सभी भुग्तभोगी है जो गृहस्थी पहले पचास प्रतिशत आय में चल जाया करती थी आज पूरी तरह कर्ज में डूब चुकी है, सरकार कि तानाशाही का आलम यह है की आज एक गरीब कि सुनवाई तो होना दूर उसे जीने के लिए अस्पताल जैसी सुविधाये भी नही हमारे देश में, आज फाइवस्टार अस्पताल का चलन है जो मात्र धनी वर्ग ही वहन कर् सकते है जबकि देश कि पच्चहत्तर प्रतिशत जनता बिना इलाज के ही मरने को मजबूर है, जाने कितनी ही पीड़ा को झेलने के बाद आज जब आम आदमिना हालत से पक गया तब उसका प्रतिशोध आज आंदोलन के रूप में फूट पड़ा, तो यह अण्णा के जनलोकपाल का  असर नही बल्कि सदियों से सहे अत्याचार का आक्रोश है ऐसे में मेरी अपील है कि आक्रोश कि यह आँधी आज के गाँधी के साथ तब तक चलनी चाहिये जब तक असल मुकाम ना हासिल ना हो जाए!  "जय हिन्द जय भारत"


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