Wednesday, August 3, 2011

स्विस बैंक और एक नई समिति का भी गठन

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के हवाले से आख़िर लिखित सूचना आ ही गयी की स्विस बैंक में भारत के कुछ लोगों खाते खोले हुए हैं देर सबेर यह भी कबूल लेंगे कि स्विस बैंकों में जमा धन अवैध है यह सब फगवा धारी बाबा का कमाल है जिसने देर  सबेर ही सही पर सच्चाई सरकारी तंत्र से निकलवा ही ली, अब प्रणव साहब का कहना है की काले धन पर सरकार ने पांच सूत्रीय रणनीति बनाई है तो आज जनता पूछना चाहती है की यह पांच सूत्रीय रणनीति कितने वर्षो में किसी मुकाम को अंजाम देगी, दूसरी बात कहीं यह  पांच सूत्रीय रणनीति के लिए जो योजना का जामाँ सरकार पहना रही है वह असलियत में देश कि जनता को बर्गलाने का एक नया पैत्रा तो नही है कि कार्यवाही में समय सीमा इतनी बड़  जाए की जनता भी एक समय के बाद इस मुद्दे को भूल ही जाए, यानी उद्देश्य गर्म माहौल से जनता को भटकाने का है,  यह बात हम सभी जानते है कि सरकार ने कई घोटाले किए जो चर्चा के विषय तो बने पर अंजाम क्या हुआ यह नही पता चल पाया, जिसकी मुख्य वजह आम जनता रोजी रोटी के चक्कर में इस कदर फँसी है  की एक समय के बात वह इन मुद्दों को बिसार देती है जिन्होंने आज उन्हें कंगाली के कगार पर खड़ा कर दिया है! सरकार की पांच सूत्रीय रणनीति के अनुसार कालेधन के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान में शामिल होना , उचित कानून बनाना , अवैध धन की जांच के लिए अलग संस्थान बनाना और प्रभावी कार्यवाही के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिए एक नई प्रणाली विकसित करना शामिल है, यह जान के अच्छा तो बहुत लगा कि सरकार बड़ी योजनाबध तरीके से इस मुद्दे को हाल करने का प्रयास कर रही है पर पुराना इतिहास गवाह है जो कमेटीया बनी वह सरकार कि कठपुतली बन कर रह गयी या भ्रष्टाचार का दूसरा अभिप्राये बन कर रह गई, और दोनों का दुष्परिणाम अंत में जनता को ही भुगतना पड़ता है यानि भ्रष्टाचार के खिलाफ  कि गयी कार्यवाही के जबाब में दोबारा भ्रष्टाचार!  सरकार के हवाले से केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष की अगुवाई में एक समिति का भी गठन किया है  जो भारत में काले धन पर अंकुश लगाने और अवैध तरीके से भारत से धन को विदेशों में जमा कराने के खिलाफ सख्त कानून बनाने के बारे में सुझाव देगी। सरकार द्वारा समिति का भी गठन करना एक मजाक हो गया है आजादी के बाद से ना जाने कितनी समितिया बनी कितने कानून पर सरकार कि विफलता में कोई बदलाव नही आया क्योकि उसके लिए सही मायने में अपराधियों को खुले आम लोकपाल बिल के तहत सजा का प्रावधान  होना चाहिए ना कि हर रोज़ एक नई समिति का गठन, आज जनता में विश्वास हासिल करने के लिए वित्त मंत्री जी कथनी और करनी को एक करना पड़ेगा वरना यह पब्ब्लिक है यह सब जानती है!

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