Monday, August 1, 2011

मोहताज



जिंदगी क्यू आज सच्चे साथ को मोहताज है!
साथी साथ ना निभाना,भाई यह कैसा  अंदाज़ है!

अपने ही घर में कब कैसे बेगाने हो गये!
रिश्ते टूटे ऐसे के नितांत अनजाने हो गये!
जिनके हाथ जीवन कि डोर वे दुश्मन पुराने हो गये!
थकते नही थे, कहते थे दोस्ती पर नाज़ है!
आज उनके ही दम से जिंदगी पर गिरी गाज है!

जिंदगी क्यू आज सच्चे साथ को मोहताज है!
साथी साथ ना निभाना,भाई यह कैसा  अंदाज़ है!

मेरी आवाज़ में तुझसे ही तो दम था!
दोनों में दिखता कभी एक दुसरे का प्रतिबिंब था!
क्या हुआ क्यों राहे जुदा जुदा हो गई!
वैसे ही जीवन में क्या गम कम था!

कभी दोस्ती, अभी दुश्मनी, यह कैसा आगाज है!
क्या हुआ कैसे हुआ, हम भी तो जाने क्या राज है!

जिंदगी क्यू आज सच्चे साथ को मोहताज है!
साथी साथ ना निभाना,भाई यह कैसा  अंदाज़ है!
                                  






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